लिखते-लिखते

लिखते-लिखते,
मैं पढ़ सकती हूँ तुम्हारी आँखों में तैरती गर्माहट,
हर एक हर्फ़ के दरमियाँ सुन सकती हूँ,
तुम्हारी उखड़ती साँसों की साफ़ आहट।

सफ़ेद सफ़े की मखमली सतह पर,
उँगलियों की वो कड़क पकड़, मैं छू सकती हूँ,
और चुपचाप पोंछ सकती हूँ ,
तुम्हारे होंठों के कोने में फँसी हुई हल्की सी मुस्कान।

मैं सूंघ सकती हूँ हवा में घुलती तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की महक को,
और थाम सकती हूँ चुपचाप, तुम्हारी छुपती हुई परछाई को!
अभी तो और भी बहुत कुछ है,
जो मैं कर सकती हूँ महज़ लिखते-लिखते!

मैं मिटा सकती हूँ हमारे बीच की ये मीलों लंबी दूरियाँ,
थकी हुई पलकों पर रख सकती हूँ सहलाती हुई उँगलियाँ।
तुम्हारी तन्हाई के ठंडे सन्नाटे में,
भर सकती हूँ अपने ही नाम की एक आँच।

कागज़ के इस पार से उस पार तक,
बिना छुए भी तुम्हें पूरा छू सकती हूँ,
बस यूँ ही एक झटके मैं, 
लिखते-लिखते।

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