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क़सूर बस तुम्हारा
लिखते-लिखते कभी जो, मैं यूँ ही कुछ दूर निकल जाऊँ, जहाँ बस मेरा पागलपन हो, और मैं एक जुनून में…
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पर्याय से परे…
एक ही अलमारी के दो ख़ानों में,आज रखे हैं कुछ शब्द,मैंने चुन कर,लगते हैं जैसे हों जुड़वाँ भाई ,एक-सी सूरत,…
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लिखते-लिखते
लिखते-लिखते,मैं पढ़ सकती हूँ तुम्हारी आँखों में तैरती गर्माहट,हर एक हर्फ़ के दरमियाँ सुन सकती हूँ,तुम्हारी उखड़ती साँसों की साफ़…