पर्याय से परे…

एक ही अलमारी के दो ख़ानों में,
आज रखे हैं कुछ शब्द,
मैंने चुन कर,
लगते हैं जैसे हों जुड़वाँ भाई ,
एक-सी सूरत, एक-सी परछाई, 
पर दोनों एक दूजे से हैं परे,
जो सहज ही उठे कदम, 
तो उसे प्रयास कहो,
जो टकराया बंद दरवाज़ों से, 
घुटनों पर आ गिरे,
उस ज़िद्दी ज़ोर को प्रयत्न लिखना।
दिमाग़ का कोई पुराना पन्ना साफ़ हो जाना,
तो महज़ भूल जाना है,
जो न ठहरा दिल में आकर , 
ना ही होंठों की मुँडेर तक आए,
वो याद न आना हुआ।
भूल जाना,
कभी-कभी एक फैसला होता है,
और याद न आना,
सिर्फ़ स्मृति की एक धुंध।
जो तड़पा रोटी की जंग में, 
वो सिर्फ़ भूखा था,
जो रहा ख़ाली सब पाकर भी, 
ताकता रहे जो रात भर छत का,
ख़ाली कोना,
वो अधूरा हुआ।
भूखा,
रोटी माँगता है,
अधूरा,
किसी अपने का होना।
जो सफ़र में साथ न चला, 
वो तो महज़ अपरिचित था,
जो साथ चलकर भी न समझा, 
वो अनजान हुआ।
हर अपरिचित,
अनजाना हो सकता है,
पर हर अनजान,
अपरिचित नहीं।
जो थिरक उठती है क्षण भर को, 
वो केवल चाह है,
पर जो तपन बन जाए रूह की, 
वो कामना का रूप हुआ।
दिल बहलाने का ज़रिया, 
तो बस एक शौक़ रहा,
जो दाँव पर लगा दे वजूद को, 
वो जूनून हुआ।
डर से अकेले मुकाबला करना ही साहस है,
पर जो रुख़ मोड़ दे इतिहास का, 
वो पराक्रम हुआ।
जो प्रेम में  सौंप दे ख़ुद को, 
वो समर्पण है,
पर जो बिक जाए मजबूरियों के बाज़ार में, 
वो नीलाम हुआ।
घड़ी की सुइयों को गिनना, 
वो महज़ इंतज़ार रहा,
पर राहों में पलकें बिछा देना,
वही तो प्रतीक्षा का रूप हुआ।
स्वयं में मुस्कुरा लेना ही तो एकांत की रँगत है,
पर जो भीड़ में कंधे से कंधा मिलाकर चलता है, 
वो अकेलापन हुआ।
अब इस बिखरे हुए सन्नाटे को,
अपनी ज़बान दो,
सिर्फ़ मौन साधे रहने से,
कब कोई मनीषी हुआ,
किताबें पढ़ जो ज्ञान पाए, 
जग कहता उसे विद्वान है,
जो चिंतन से सच को खोजे, 
वो मनीषी महान है।
मन में जो जागे वो इच्छा, 
दुआ बने तो कामना है,
शब्दों के इस भेद को समझो, 
यही भाषा की साधना है।

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