क़सूर बस तुम्हारा

लिखते-लिखते कभी जो, मैं यूँ ही कुछ दूर निकल जाऊँ,

जहाँ बस मेरा पागलपन हो, और मैं एक जुनून में ढल जाऊँ।
अगर वहाँ से लौट न पाऊँ, तो यह क़सूर बस तुम्हारा है,
मुझे खींचकर इस मुहाने तक लाने वाला नाम तुम्हारा है ।

जब भीतर कुछ पूरी तरह से टूट-टूटकर बिखरता है,
जहाँ हर एक सोया अहसास अचानक सच सा लगता है।
जब सीने में कोई उठने लगता है तूफ़ान सा ,
और सांसें उखड़ने लगती हैं, मन रहता है बेचैन-हैरान सा।

काँपते हाथों में जब यह कलम ठहर नहीं पाती,
जब बेचैनी की कोई सीमा तय भी हो नहीं पाती।
स्याही के इस मीठे बहकावे में गर मैं खो जाऊँ,
अपनी ही गढ़ी ख़ामोशी में सीमा से पार हो जाऊँ।

तो दोष तुम्हारा होगा, इस कागज़ और कलम का होगा,
जो ये उर में उकेरा है तुमने, उस अहम् का होगा, 
क्योंकि जब कोई विचार रूह को इस कदर झकझोरता है,
तब शब्दों का हर दायरा बेचैनी में दम तोड़ता है!

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