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क़सूर बस तुम्हारा
Read more: क़सूर बस तुम्हारालिखते-लिखते कभी जो, मैं यूँ ही कुछ दूर निकल जाऊँ, जहाँ बस मेरा पागलपन हो, और मैं एक जुनून में ढल जाऊँ।अगर वहाँ से लौट न पाऊँ, तो यह क़सूर बस तुम्हारा है,मुझे खींचकर इस मुहाने तक लाने वाला नाम तुम्हारा है । जब भीतर कुछ पूरी तरह से टूट-टूटकर बिखरता है,जहाँ हर एक सोया अहसास अचानक…
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पर्याय से परे…
Read more: पर्याय से परे…एक ही अलमारी के दो ख़ानों में,आज रखे हैं कुछ शब्द,मैंने चुन कर,लगते हैं जैसे हों जुड़वाँ भाई ,एक-सी सूरत, एक-सी परछाई, पर दोनों एक दूजे से हैं परे,जो सहज ही उठे कदम, तो उसे प्रयास कहो,जो टकराया बंद दरवाज़ों से, घुटनों पर आ गिरे,उस ज़िद्दी ज़ोर को प्रयत्न लिखना।दिमाग़ का कोई पुराना पन्ना साफ़ हो जाना,तो महज़ भूल…
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लिखते-लिखते
Read more: लिखते-लिखतेलिखते-लिखते,मैं पढ़ सकती हूँ तुम्हारी आँखों में तैरती गर्माहट,हर एक हर्फ़ के दरमियाँ सुन सकती हूँ,तुम्हारी उखड़ती साँसों की साफ़ आहट। सफ़ेद सफ़े की मखमली सतह पर,उँगलियों की वो कड़क पकड़, मैं छू सकती हूँ,और चुपचाप पोंछ सकती हूँ ,तुम्हारे होंठों के कोने में फँसी हुई हल्की सी मुस्कान। मैं सूंघ सकती हूँ हवा में…